Session on “Destroy Caste System” with Agniveer in New Delhi Jan 25, 2013 01:52 pm | Agniveer Agni


Session on “Destroy Caste System” with Agniveer in New Delhi
Jan 25, 2013 01:52 pm | Agniveer Agni

Lets destroy Caste System! I am human. My caste is human. My race is human. My color is human. My religion is humanity. I am Agniveer! And I dont care about anything else!

Session with founder, Agniveer- Shri Sanjeev Newar in Delhi on Caste System and its eradication!

Date: Sunday, 27th January, 2013
Time: 3:30 pm to 5:30 pm
Venue: Arya Samaj Patel Nagar (New Delhi)

Google Map Directions

(Next to Dayanand Model School, walking distance from Patel Nagar Metro Station on Blue Line (5 stations from Rajiv Chowk). You need to walk ahead of Patel Nagar Metro Station towards Shadipur Station and take a right turn at red light. Walk straight till end of the road and Arya Samaj is right there. For assistance, call +91 8800958058)

Date and Time: 20 January 2012, 3:30 PM to 5:30 PM

About Sri Sanjeev Newar:

Sri Sanjeev Newar is founder of Agniveer – the most popular spiritualism website in world – that been instrumental in transforming lives of millions. Professionally he is an IIT-IIM graduate with more than a decade of experience working with globally acclaimed organizations and top-notch researchers of world. He also teaches and indulges in finance, quantitative methods, artificial intelligence, yog, pranayam, meditation, martial arts etc as pastime. Agniveer is known to be the most vocal, logical and irrefutable critic of caste system in current era. Under his guidance, Agniveer has taken several programs to elevate so-called low caste into so-called high caste status so as to destroy the caste system from very roots.

http://sanjeevnewar.com

All are invited!

Note: All patriots who can commit time, efforts and resources for operational success and want to contribute to the mission are invited for the meeting at 5:30 pm just after the session.

Brahmin, Shudra….I don’t care
Jan 24, 2013 02:12 pm | Sanjeev

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The post मनुस्मृति और शूद्र appeared first on Agniveer.


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Agniveer

Published 07/20/2012
मनुस्मृति और शूद्र
Jul 19, 2012 06:22 pm | Arya Musafir

Original post in English is available at http://agniveer.com/manu-smriti-and-shudras/

भारत में आज अनेक संकट छाये हुए हैं – भ्रष्टाचार, आतंकवाद, कट्टरवाद, धर्मांतरण, नैतिक अध : पतन, अशिक्षा, चरमरायी हुई स्वास्थ्य व्यवस्था, सफ़ाई की समस्या वगैरह – वगैरह | पर इन सभी से ज्यादा भयावह है – जन्मना जातिवाद और लिंग भेद | क्योंकि यह दो मूलभूत समस्याएँ ही बाकी समस्याओं को पनपने में मदद करती हैं | यह दो प्रश्न ही हमारे भूत और वर्तमान की समस्त आपदाओं का मुख्य कारण हैं | इन को मूल से ही नष्ट नहीं किया तो हमारा उज्जवल भविष्य सिर्फ़ एक सपना बनकर रह जाएगा क्योंकि एक समृद्ध और समर्थ समाज का अस्तित्व जाति प्रथा और लिंग भेद के साथ नहीं हो सकता |

यह भी गौर किया जाना चाहिए कि जाति भेद और लिंग भेद केवल हिन्दू समाज की ही समस्याएँ नहीं हैं किन्तु यह दोनों सांस्कृतिक समस्याएँ हैं | लिंग भेद सदियों से वैश्विक समस्या रही है और जाति भेद दक्षिण एशिया में पनपी हुई, सभी धर्मों और समाजों को छूती हुई समस्या है | चूँकि हिन्दुत्व सबसे प्राचीन संस्कृति और सभी धर्मों का आदिस्रोत है, इसी पर व्यवस्था को भ्रष्ट करने का आक्षेप मढ़ा जाता है | यदि इन दो कुप्रथाओं को हम ढोते रहते हैं तो समाज इतना दुर्बल हो जाएगा कि विभिन्न सम्प्रदायों और फिरकों में बिखरता रहेगा जिससे देश कमजोर होगा और टूटेगा |

अपनी कमजोरी और विकृतियों के बारे में हमने इतिहास से कोई शिक्षा नहीं ली है | आज की तारीख़ में भी कुछ शिक्षित और बुद्धिवादी कहे जाने वाले लोग इन दो कुप्रथाओं का समर्थन करते हैं – यह आश्चर्य की बात है | जन्म से ही ऊँचेपन का भाव इतना हावी है कि वह किसी समझदार को भी पागल बना दे | इस वैचारिक संक्रमण से ग्रस्त कुछ लोग आज हिन्दुत्व के विद्वानों और नेतागणों में भी गिने जा रहे हैं | अनजान बनकर यह लोग इन कुप्रथाओं का समर्थन करने के लिए प्राचीन शास्त्रों का हवाला देते हैं जिस में समाज व्यवस्था देनेवाली प्राचीनतम मनुस्मृति को सबसे अधिक केंद्र बनाया जाता है | वेदों को भी इस कुटिलता में फंसाया गया, जिसका खंडन हम http://agniveer.com/series/caste-series/ में कर चुके हैं |

मनुस्मृति जो सृष्टि में नीति और धर्म ( कानून) का निर्धारण करने वाला सबसे पहला ग्रंथ माना गया है उस को घोर जाति प्रथा को बढ़ावा देने वाला भी बताया जा रहा है |आज स्थिति यह है कि मनुस्मृति वैदिक संस्कृति की सबसे अधिक विवादित पुस्तकों में है | पूरा का पूरा दलित आन्दोलन ‘ मनुवाद ‘ के विरोध पर ही खड़ा हुआ है |

मनु जाति प्रथा के समर्थकों के नायक हैं तो दलित नेताओं ने उन्हें खलनायक के सांचे में ढाल रखा है | पिछड़े तबकों के प्रति प्यार का दिखावा कर स्वार्थ की रोटियां सेकने के लिए ही अग्निवेश और मायावती जैसे बहुत से लोगों द्वारा मनुस्मृति जलाई जाती रही है | अपनी विकृत भावनाओं को पूरा करने के लिए नीची जातियों पर अत्याचार करने वाले, एक सींग वाले विद्वान राक्षस के रूप में भी मनु को चित्रित किया गया है | हिन्दुत्व और वेदों को गालियां देने वाले कथित सुधारवादियों के लिए तो मनुस्मृति एक पसंदीदा साधन बन गया है| विधर्मी वायरस पीढ़ियों से हिन्दुओं के धर्मांतरण में इससे फ़ायदा उठाते आए हैं जो आज भी जारी है | ध्यान देने वाली बात यह है कि मनु की निंदा करने वाले इन लोगों ने मनुस्मृति को कभी गंभीरता से पढ़ा भी है कि नहीं |

दूसरी ओर जातीय घमंड में चूर और उच्चता में अकड़े हुए लोगों के लिए मनुस्मृति एक ऐसा धार्मिक ग्रंथ है जो उन्हें एक विशिष्ट वर्ग में नहीं जन्में लोगों के प्रति सही व्यवहार नहीं करने का अधिकार और अनुमति देता है| ऐसे लोग मनुस्मृति से कुछ एक गलत और भ्रष्ट श्लोकों का हवाला देकर जातिप्रथा को उचित बताते हैं पर स्वयं की अनुकूलता और स्वार्थ के लिए यह भूलते हैं कि वह जो कह रहे हैं उसे के बिलकुल विपरीत अनेक श्लोक हैं |

इन दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष ने आज भारत में निचले स्तर की राजनीति को जन्म दिया है |भारतवर्ष पर लगातार पिछले हजार वर्षों से होते आ रहे आक्रमणों के लिए भी यही जिम्मेदार है| सदियों तक नरपिशाच,गोहत्यारे और पापियों से यह पावन धरती शासित रही| यह अतार्किक जातिप्रथा ही १९४७ में हमारे देश के बंटवारे का प्रमुख कारण रही है| कभी विश्वगुरु और चक्रवर्ती सम्राटों का यह देश था | आज भी हम में असीम क्षमता और बुद्धि धन है फ़िर भी हम समृद्धि और सामर्थ्य की ओर अपने देश को नहीं ले जा पाए और निर्बल और निराधार खड़े हैं – इस का प्रमुख कारण यह मलिन जाति प्रथा है| इसलिए मनुस्मृति की सही परिपेक्ष्य में जाँच – परख़ अत्यंत आवश्यक हो जाती है |

मनुस्मृति पर लगाये जाने वाले तीन मुख्य आक्षेप :

१. मनु ने जन्म के आधार पर जातिप्रथा का निर्माण किया |

२. मनु ने शूद्रों के लिए कठोर दंड का विधान किया और ऊँची जाति खासकर ब्राह्मणों के लिए विशेष प्रावधान रखे |

३. मनु नारी का विरोधी था और उनका तिरस्कार करता था | उसने स्त्रियों के लिए पुरुषों से कम अधिकार का विधान किया |

आइये अब मनुस्मृति के साक्ष्यों पर ही हम इन आक्षेपों की समीक्षा करें | इस लेख में हम पहले आरोप – मनु द्वारा जन्म आधारित जाति प्रथा के निर्माण पर विचार करेंगे |

पाठकों से निवेदन है कि वे http://agniveer.com/series/caste-series/को पढ़ें ताकि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के सही अर्थों को समझ सकें |

मनुस्मृति और जाति व्यवस्था :

मनुस्मृति उस काल की है जब जन्मना जाति व्यवस्था के विचार का भी कोई अस्तित्व नहीं था | अत: मनुस्मृति जन्मना समाज व्यवस्था का कहीं भी समर्थन नहीं करती | महर्षि मनु ने मनुष्य के गुण- कर्म – स्वभाव पर आधारित समाज व्यवस्था की रचना कर के वेदों में परमात्मा द्वारा दिए गए आदेश का ही पालन किया है (देखें – ऋग्वेद-१०.१०.११-१२, यजुर्वेद-३१.१०-११, अथर्ववेद-१९.६.५-६) |

यह वर्ण व्यवस्था है | वर्ण शब्द “वृञ” धातु से बनता है जिसका मतलब है चयन या चुनना और सामान्यत: प्रयुक्त शब्द वरण भी यही अर्थ रखता है | जैसे वर अर्थात् कन्या द्वारा चुना गया पति, जिससे पता चलता है कि वैदिक व्यवस्था कन्या को अपना पति चुनने का पूर्ण अधिकार देती है |

मनुस्मृति में वर्ण व्यवस्था को ही बताया गया है और जाति व्यवस्था को नहीं इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में कहीं भी जाति या गोत्र शब्द ही नहीं है बल्कि वहां चार वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन है | यदि जाति या गोत्र का इतना ही महत्त्व होता तो मनु इसका उल्लेख अवश्य करते कि कौनसी जाति ब्राह्मणों से संबंधित है, कौनसी क्षत्रियों से, कौनसी वैश्यों और शूद्रों से |

इस का मतलब हुआ कि स्वयं को जन्म से ब्राह्मण या उच्च जाति का मानने वालों के पास इसका कोई प्रमाण नहीं है | ज्यादा से ज्यादा वे इतना बता सकते हैं कि कुछ पीढ़ियों पहले से उनके पूर्वज स्वयं को ऊँची जाति का कहलाते आए हैं | ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि सभ्यता के आरंभ से ही यह लोग ऊँची जाति के थे | जब वह यह साबित नहीं कर सकते तो उनको यह कहने का क्या अधिकार है कि आज जिन्हें जन्मना शूद्र माना जाता है, वह कुछ पीढ़ियों पहले ब्राह्मण नहीं थे ? और स्वयं जो अपने को ऊँची जाति का कहते हैं वे कुछ पीढ़ियों पहले शूद्र नहीं थे ?

मनुस्मृति ३.१०९ में साफ़ कहा है कि अपने गोत्र या कुल की दुहाई देकर भोजन करने वाले को स्वयं का उगलकर खाने वाला माना जाए | अतः मनुस्मृति के अनुसार जो जन्मना ब्राह्मण या ऊँची जाति वाले अपने गोत्र या वंश का हवाला देकर स्वयं को बड़ा कहते हैं और मान-सम्मान की अपेक्षा रखते हैं उन्हें तिरस्कृत किया जाना चाहिए |

मनुस्मृति २. १३६: धनी होना, बांधव होना, आयु में बड़े होना, श्रेष्ठ कर्म का होना और विद्वत्ता यह पाँच सम्मान के उत्तरोत्तर मानदंड हैं | इन में कहीं भी कुल, जाति, गोत्र या वंश को सम्मान का मानदंड नहीं माना गया है |

वर्णों में परिवर्तन :

मनुस्मृति १०.६५: ब्राह्मण शूद्र बन सकता और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है | इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपने वर्ण बदल सकते हैं |

मनुस्मृति ९.३३५: शरीर और मन से शुद्ध- पवित्र रहने वाला, उत्कृष्ट लोगों के सानिध्य में रहने वाला, मधुरभाषी, अहंकार से रहित, अपने से उत्कृष्ट वर्ण वालों की सेवा करने वाला शूद्र भी उत्तम ब्रह्म जन्म और द्विज वर्ण को प्राप्त कर लेता है |

मनुस्मृति के अनेक श्लोक कहते हैं कि उच्च वर्ण का व्यक्ति भी यदि श्रेष्ट कर्म नहीं करता, तो शूद्र (अशिक्षित) बन जाता है |

उदाहरण-

२.१०३: जो मनुष्य नित्य प्रात: और सांय ईश्वर आराधना नहीं करता उसको शूद्र समझना चाहिए |

२.१७२: जब तक व्यक्ति वेदों की शिक्षाओं में दीक्षित नहीं होता वह शूद्र के ही समान है |

४.२४५ : ब्राह्मण- वर्णस्थ व्यक्ति श्रेष्ट – अति श्रेष्ट व्यक्तियों का संग करते हुए और नीच- नीचतर व्यक्तिओं का संग छोड़कर अधिक श्रेष्ट बनता जाता है | इसके विपरीत आचरण से पतित होकर वह शूद्र बन जाता है | अतः स्पष्ट है कि ब्राह्मण उत्तम कर्म करने वाले विद्वान व्यक्ति को कहते हैं और शूद्र का अर्थ अशिक्षित व्यक्ति है | इसका, किसी भी तरह जन्म से कोई सम्बन्ध नहीं है |

२.१६८: जो ब्राह्मण,क्षत्रिय या वैश्य वेदों का अध्ययन और पालन छोड़कर अन्य विषयों में ही परिश्रम करता है, वह शूद्र बन जाता है | और उसकी आने वाली पीढ़ियों को भी वेदों के ज्ञान से वंचित होना पड़ता है | अतः मनुस्मृति के अनुसार तो आज भारत में कुछ अपवादों को छोड़कर बाकी सारे लोग जो भ्रष्टाचार, जातिवाद, स्वार्थ साधना, अन्धविश्वास, विवेकहीनता, लिंग-भेद, चापलूसी, अनैतिकता इत्यादि में लिप्त हैं – वे सभी शूद्र हैं |

२ .१२६: भले ही कोई ब्राह्मण हो, लेकिन अगर वह अभिवादन का शिष्टता से उत्तर देना नहीं जानता तो वह शूद्र (अशिक्षित व्यक्ति) ही है |

शूद्र भी पढ़ा सकते हैं :

शूद्र भले ही अशिक्षित हों तब भी उनसे कौशल और उनका विशेष ज्ञान प्राप्त किया जाना चाहिए |

२.२३८: अपने से न्यून व्यक्ति से भी विद्या को ग्रहण करना चाहिए और नीच कुल में जन्मी उत्तम स्त्री को भी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए|

२.२४१ : आवश्यकता पड़ने पर अ-ब्राह्मण से भी विद्या प्राप्त की जा सकती है और शिष्यों को पढ़ाने के दायित्व का पालन वह गुरु जब तक निर्देश दिया गया हो तब तक करे |

ब्राह्मणत्व का आधार कर्म :

मनु की वर्ण व्यवस्था जन्म से ही कोई वर्ण नहीं मानती | मनुस्मृति के अनुसार माता- पिता को बच्चों के बाल्यकाल में ही उनकी रूचि और प्रवृत्ति को पहचान कर ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य वर्ण का ज्ञान और प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए भेज देना चाहिए |

कई ब्राह्मण माता – पिता अपने बच्चों को ब्राह्मण ही बनाना चाहते हैं परंतु इस के लिए व्यक्ति में ब्रह्मणोचित गुण, कर्म,स्वभाव का होना अति आवश्यक है| ब्राह्मण वर्ण में जन्म लेने मात्र से या ब्राह्मणत्व का प्रशिक्षण किसी गुरुकुल में प्राप्त कर लेने से ही कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता, जब तक कि उसकी योग्यता, ज्ञान और कर्म ब्रह्मणोचित न हों |

२.१५७ : जैसे लकड़ी से बना हाथी और चमड़े का बनाया हुआ हरिण सिर्फ़ नाम के लिए ही हाथी और हरिण कहे जाते हैं वैसे ही बिना पढ़ा ब्राह्मण मात्र नाम का ही ब्राह्मण होता है |

२.२८: पढने-पढ़ाने से, चिंतन-मनन करने से, ब्रह्मचर्य, अनुशासन, सत्यभाषण आदि व्रतों का पालन करने से, परोपकार आदि सत्कर्म करने से, वेद, विज्ञान आदि पढने से, कर्तव्य का पालन करने से, दान करने से और आदर्शों के प्रति समर्पित रहने से मनुष्य का यह शरीर ब्राह्मण किया जाता है |

शिक्षा ही वास्तविक जन्म :

मनु के अनुसार मनुष्य का वास्तविक जन्म विद्या प्राप्ति के उपरांत ही होता है | जन्मतः प्रत्येक मनुष्य शूद्र या अशिक्षित है | ज्ञान और संस्कारों से स्वयं को परिष्कृत कर योग्यता हासिल कर लेने पर ही उसका दूसरा जन्म होता है और वह द्विज कहलाता है | शिक्षा प्राप्ति में असमर्थ रहने वाले शूद्र ही रह जाते हैं |

यह पूर्णत: गुणवत्ता पर आधारित व्यवस्था है, इसका शारीरिक जन्म या अनुवांशिकता से कोई लेना-देना नहीं है|

२.१४८ : वेदों में पारंगत आचार्य द्वारा शिष्य को गायत्री मंत्र की दीक्षा देने के उपरांत ही उसका वास्तविक मनुष्य जन्म होता है | यह जन्म मृत्यु और विनाश से रहित होता है |ज्ञानरुपी जन्म में दीक्षित होकर मनुष्य मुक्ति को प्राप्त कर लेता है| यही मनुष्य का वास्तविक उद्देश्य है| सुशिक्षा के बिना मनुष्य ‘ मनुष्य’ नहीं बनता|

इसलिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य होने की बात तो छोडो जब तक मनुष्य अच्छी तरह शिक्षित नहीं होगा तब तक उसे मनुष्य भी नहीं माना जाएगा |

२.१४६ : जन्म देने वाले पिता से ज्ञान देने वाला आचार्य रूप पिता ही अधिक बड़ा और माननीय है, आचार्य द्वारा प्रदान किया गया ज्ञान मुक्ति तक साथ देता हैं | पिताद्वारा प्राप्त शरीर तो इस जन्म के साथ ही नष्ट हो जाता है|

२.१४७ : माता- पिता से उत्पन्न संतति का माता के गर्भ से प्राप्त जन्म साधारण जन्म है| वास्तविक जन्म तो शिक्षा पूर्ण कर लेने के उपरांत ही होता है|

अत: अपनी श्रेष्टता साबित करने के लिए कुल का नाम आगे धरना मनु के अनुसार अत्यंत मूर्खतापूर्ण कृत्य है | अपने कुल का नाम आगे रखने की बजाए व्यक्ति यह दिखा दे कि वह कितना शिक्षित है तो बेहतर होगा |

१०.४: ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, ये तीन वर्ण विद्याध्ययन से दूसरा जन्म प्राप्त करते हैं | विद्याध्ययन न कर पाने वाला शूद्र, चौथा वर्ण है | इन चार वर्णों के अतिरिक्त आर्यों में या श्रेष्ट मनुष्यों में पांचवा कोई वर्ण नहीं है |

इस का मतलब है कि अगर कोई अपनी शिक्षा पूर्ण नहीं कर पाया तो वह दुष्ट नहीं हो जाता | उस के कृत्य यदि भले हैं तो वह अच्छा इन्सान कहा जाएगा | और अगर वह शिक्षा भी पूरी कर ले तो वह भी द्विज गिना जाएगा | अत: शूद्र मात्र एक विशेषण है, किसी जाति विशेष का नाम नहीं |

‘नीच’ कुल में जन्में व्यक्ति का तिरस्कार नहीं :

किसी व्यक्ति का जन्म यदि ऐसे कुल में हुआ हो, जो समाज में आर्थिक या अन्य दृष्टी से पनप न पाया हो तो उस व्यक्ति को केवल कुल के कारण पिछड़ना न पड़े और वह अपनी प्रगति से वंचित न रह जाए, इसके लिए भी महर्षि मनु ने नियम निर्धारित किए हैं |

४.१४१: अपंग, अशिक्षित, बड़ी आयु वाले, रूप और धन से रहित या निचले कुल वाले, इन को आदर और / या अधिकार से वंचित न करें | क्योंकि यह किसी व्यक्ति की परख के मापदण्ड नहीं हैं|

प्राचीन इतिहास में वर्ण परिवर्तन के उदाहरण :

ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र वर्ण की सैद्धांतिक अवधारणा गुणों के आधार पर है, जन्म के आधार पर नहीं | यह बात सिर्फ़ कहने के लिए ही नहीं है, प्राचीन समय में इस का व्यवहार में चलन था | जब से इस गुणों पर आधारित वैज्ञानिक व्यवस्था को हमारे दिग्भ्रमित पुरखों ने मूर्खतापूर्ण जन्मना व्यवस्था में बदला है, तब से ही हम पर आफत आ पड़ी है जिस का सामना आज भी कर रहें हैं|

वर्ण परिवर्तन के कुछ उदाहरण –

(a) ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे | परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की | ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है |

(b) ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे | जुआरी और हीन चरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये |ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया | (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९)

(c) सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए |

(d) राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.१.१४)
अगर उत्तर रामायण की मिथ्या कथा के अनुसार शूद्रों के लिए तपस्या करना मना होता तो पृषध ये कैसे कर पाए?

(e) राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए | पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.१.१३)

(f) धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२)

(g) आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.२.२)

(h) भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए |

(i) विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |

(j) हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.३.५)

(k) क्षत्रियकुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.८.१) वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए| इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य के उदाहरण हैं |

(l) मातंग चांडालपुत्र से ब्राह्मण बने |

(m) ऋषि पुलस्त्य का पौत्र रावण अपने कर्मों से राक्षस बना |

(n) राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ |

(o) त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे |

(p) विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्र वर्ण अपनाया | विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया |

(q) विदुर दासी पुत्र थे | तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया |

(r) वत्स शूद्र कुल में उत्पन्न होकर भी ऋषि बने (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९) |

(s) मनुस्मृति के प्रक्षिप्त श्लोकों से भी पता चलता है कि कुछ क्षत्रिय जातियां, शूद्र बन गईं | वर्ण परिवर्तन की साक्षी देने वाले यह श्लोक मनुस्मृति में बहुत बाद के काल में मिलाए गए हैं | इन परिवर्तित जातियों के नाम हैं – पौण्ड्रक, औड्र, द्रविड, कम्बोज, यवन, शक, पारद, पल्हव, चीन, किरात, दरद, खश |

(t) महाभारत अनुसन्धान पर्व (३५.१७-१८) इसी सूची में कई अन्य नामों को भी शामिल करता है – मेकल, लाट, कान्वशिरा, शौण्डिक, दार्व, चौर, शबर, बर्बर|

(u) आज भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और दलितों में समान गोत्र मिलते हैं | इस से पता चलता है कि यह सब एक ही पूर्वज, एक ही कुल की संतान हैं | लेकिन कालांतर में वर्ण व्यवस्था गड़बड़ा गई और यह लोग अनेक जातियों में बंट गए |

शूद्रों के प्रति आदर :

मनु परम मानवीय थे| वे जानते थे कि सभी शूद्र जानबूझ कर शिक्षा की उपेक्षा नहीं कर सकते | जो किसी भी कारण से जीवन के प्रथम पर्व में ज्ञान और शिक्षा से वंचित रह गया हो, उसे जीवन भर इसकी सज़ा न भुगतनी पड़े इसलिए वे समाज में शूद्रों के लिए उचित सम्मान का विधान करते हैं | उन्होंने शूद्रों के प्रति कभी अपमान सूचक शब्दों का प्रयोग नहीं किया, बल्कि मनुस्मृति में कई स्थानों पर शूद्रों के लिए अत्यंत सम्मानजनक शब्द आए हैं |

मनु की दृष्टी में ज्ञान और शिक्षा के अभाव में शूद्र समाज का सबसे अबोध घटक है, जो परिस्थितिवश भटक सकता है | अत: वे समाज को उसके प्रति अधिक सहृदयता और सहानुभूति रखने को कहते हैं |

कुछ और उदात्त उदाहरण देखें –

३.११२: शूद्र या वैश्य के अतिथि रूप में आ जाने पर, परिवार उन्हें सम्मान सहित भोजन कराए |

३.११६: अपने सेवकों (शूद्रों) को पहले भोजन कराने के बाद ही दंपत्ति भोजन करें |

२.१३७: धन, बंधू, कुल, आयु, कर्म, श्रेष्ट विद्या से संपन्न व्यक्तियों के होते हुए भी वृद्ध शूद्र को पहले सम्मान दिया जाना चाहिए |

मनुस्मृति वेदों पर आधारित :

वेदों को छोड़कर अन्य कोई ग्रंथ मिलावटों से बचा नहीं है | वेद प्रक्षेपों से कैसे अछूते रहे, जानने के लिए ‘ वेदों में परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता ? ‘ पढ़ें | वेद ईश्वरीय ज्ञान है और सभी विद्याएँ उसी से निकली हैं | उन्हीं को आधार मानकर ऋषियों ने अन्य ग्रंथ बनाए| वेदों का स्थान और प्रमाणिकता सबसे ऊपर है और उनके रक्षण से ही आगे भी जगत में नए सृजन संभव हैं | अत: अन्य सभी ग्रंथ स्मृति, ब्राह्मण, महाभारत, रामायण, गीता, उपनिषद, आयुर्वेद, नीतिशास्त्र, दर्शन इत्यादि को परखने की कसौटी वेद ही हैं | और जहां तक वे वेदानुकूल हैं वहीं तक मान्य हैं |

मनु भी वेदों को ही धर्म का मूल मानते हैं (२.८-२.११)

२.८: विद्वान मनुष्य को अपने ज्ञान चक्षुओं से सब कुछ वेदों के अनुसार परखते हुए, कर्तव्य का पालन करना चाहिए |

इस से साफ़ है कि मनु के विचार, उनकी मूल रचना वेदानुकूल ही है और मनुस्मृति में वेद विरुद्ध मिलने वाली मान्यताएं प्रक्षिप्त मानी जानी चाहियें |

शूद्रों को भी वेद पढने और वैदिक संस्कार करने का अधिकार :

वेद में ईश्वर कहता है कि मेरा ज्ञान सबके लिए समान है चाहे पुरुष हो या नारी, ब्राह्मण हो या शूद्र सबको वेद पढने और यज्ञ करने का अधिकार है |

देखें – यजुर्वेद २६.१, ऋग्वेद १०.५३.४, निरुक्त ३.८ इत्यादि और http://agniveer.com/series/caste-series/ |

और मनुस्मृति भी यही कहती है | मनु ने शूद्रों को उपनयन ( विद्या आरंभ ) से वंचित नहीं रखा है | इसके विपरीत उपनयन से इंकार करने वाला ही शूद्र कहलाता है |

वेदों के ही अनुसार मनु शासकों के लिए विधान करते हैं कि वे शूद्रों का वेतन और भत्ता किसी भी परिस्थिति में न काटें ( ७.१२-१२६, ८.२१६) |

संक्षेप में –

मनु को जन्मना जाति – व्यवस्था का जनक मानना निराधार है | इसके विपरीत मनु मनुष्य की पहचान में जन्म या कुल की सख्त उपेक्षा करते हैं | मनु की वर्ण व्यवस्था पूरी तरह गुणवत्ता पर टिकी हुई है |

प्रत्येक मनुष्य में चारों वर्ण हैं – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र | मनु ने ऐसा प्रयत्न किया है कि प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान जो सबसे सशक्त वर्ण है – जैसे किसी में ब्राह्मणत्व ज्यादा है, किसी में क्षत्रियत्व, इत्यादि का विकास हो और यह विकास पूरे समाज के विकास में सहायक हो |

अगले लेखों में हम मनु पर थोपे गए अन्य आरोप जैसे शूद्रों के लिए कठोर दंड विधान तथा स्त्री विरोधी होने की सच्चाई को जानेंगे |

लेकिन मनु पाखंडी और आचरणहीनों के लिए क्या कहते हैं, यह भी देख लेते हैं –

४.३०: पाखंडी, गलत आचरण वाले, छली – कपटी, धूर्त, दुराग्रही, झूठ बोलने वाले लोगों का सत्कार वाणी मात्र से भी न करना चाहिए |

जन्मना जाति व्यवस्था को मान्य करने की प्रथा एक सभ्य समाज के लिए कलंक है और अत्यंत छल-कपट वाली, विकृत और झूठी व्यवस्था है | वेद और मनु को मानने वालों को इस घिनौनी प्रथा का सशक्त प्रतिकार करना चाहिए | शब्दों में भी उसके प्रति अच्छा भाव रखना मनु के अनुसार घृणित कृत्य है |

प्रश्न : मनुस्मृति से ऐसे सैंकड़ों श्लोक दिए जा सकते हैं, जिन्हें जन्मना जातिवाद और लिंग-भेद के समर्थन में पेश किया जाता है | क्या आप बतायेंगे कि इन सब को कैसे प्रक्षिप्त माना जाए ?

अग्निवीर: यही तो सोचने वाली बात है कि मनुस्मृति में जन्मना जातिवाद के विरोधी और समर्थक दोनों तरह के श्लोक कैसे हैं ? इस का मतलब मनुस्मृति का गहरे से अध्ययन और परीक्षण किए जाने की आवश्यता है | जो हम अगले लेख में करेंगे, अभी संक्षेप में देखते हैं –

आज मिलने वाली मनुस्मृति में बड़ी मात्रा में मनमाने प्रक्षेप पाए जाते हैं, जो बहुत बाद के काल में मिलाए गए | वर्तमान मनुस्मृति लगभग आधी नकली है| सिर्फ़ मनुस्मृति ही प्रक्षिप्त नहीं है | वेदों को छोड़ कर जो अपनी अद्भुत स्वर और पाठ रक्षण पद्धतियों के कारण आज भी अपने मूल स्वरुप में है | लगभग अन्य सभी सम्प्रदायों के ग्रंथों में स्वाभाविकता से परिवर्तन, मिलावट या हटावट की जा सकती है | जिनमें रामायण, महाभारत, बाइबल, कुरान इत्यादि भी शामिल हैं | भविष्य पुराण में तो मिलावट का सिलसिला छपाई के आने तक चलता रहा |

आज रामायण के तीन संस्करण मिलते हैं – १. दाक्षिणात्य २. पश्चिमोत्तरीय ३. गौडीय और यह तीनों ही भिन्न हैं | गीता प्रेस, गोरखपुर ने भी रामायण के कई सर्ग प्रक्षिप्त नाम से चिन्हित किए हैं | कई विद्वान बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड के अधिकांश भाग को प्रक्षिप्त मानते हैं |

महाभारत भी अत्यधिक प्रक्षिप्त हो चुका ग्रंथ है | गरुड़ पुराण ( ब्रह्मकांड १.५४ ) में कहा गया है कि कलियुग के इस समय में धूर्त स्वयं को ब्राह्मण बताकर महाभारत में से कुछ श्लोकों को निकाल रहे हैं और नए श्लोक बना कर डाल रहे हैं |

महाभारत का शांतिपर्व (२६५.९,४) स्वयं कह रहा है कि वैदिक ग्रंथ स्पष्ट रूप से शराब, मछली, मांस का निषेध करते हैं | इन सब को धूर्तों ने प्रचलित कर दिया है, जिन्होंने कपट से ऐसे श्लोक बनाकर शास्त्रों में मिला दिए हैं |

मूल बाइबल जिसे कभी किसी ने देखा हो वह आज अस्तित्व में ही नहीं है | हमने उसके अनुवाद के अनुवाद के अनुवाद ही देखे हैं |

कुरान भी मुहम्मद के उपदेशों की परिवर्तित आवृत्ति ही है, ऐसा कहा जाता है | देखें -http://satyagni.com/3118/miracle-islam/

इसलिए इस में कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि मनुस्मृति जो सामाजिक व्यवस्थाओं पर सबसे प्राचीन ग्रंथ है उसमें भी अनेक परिवर्तन किए गए हों | यह सम्भावना अधिक इसलिए है कि मनुस्मृति सर्व साधारण के दैनिक जीवन को, पूरे समाज को और राष्ट्र की राजनीति को प्रभावित करने वाला ग्रंथ रहा है | यदि देखा जाए तो सदियों तक वह एक प्रकार से मनुष्य जाति का संविधान ही रहा है | इसलिए धूर्तों और मक्कारों के लिए मनु स्मृति में प्रक्षेप करने के बहुत सारे प्रलोभन थे |

मनुस्मृति का पुनरावलोकन करने पर चार प्रकार के प्रक्षेप दिखायी देते हैं – विस्तार करने के लिए, स्वप्रयोजन की सिद्धी के लिए, अतिश्योक्ति या बढ़ा- चढ़ा कर बताने के लिए, दूषित करने के लिए| अधिकतर प्रक्षेप सीधे- सीधे दिख ही रहें हैं | डा. सुरेन्द्र कुमार ने मनु स्मृति का विस्तृत और गहन अध्ययन किया है | जिसमें प्रत्येक श्लोक का भिन्न- भिन्न रीतियों से परीक्षण और पृथक्करण किया है ताकि प्रक्षिप्त श्लोकों को अलग से जांचा जा सके | उन्होंने मनुस्मृति के २६८५ में से १४७१ श्लोक प्रक्षिप्त पाए हैं |

प्रक्षेपों का वर्गीकरण वे इस प्रकार करते हैं –

– विषय से बाहर की कोई बात हो |

– संदर्भ से विपरीत हो या विभिन्न हो |

– पहले जो कहा गया, उसके विरुद्ध हो या पूर्वापार सम्बन्ध न हो |

– पुनरावर्तन हो |

– भाषा की विभिन्न शैली और प्रयोग हो |

– वेद विरुद्ध हो |

इसे और अच्छी तरह से समझने के लिए, मनुस्मृति के गहन और निष्पक्ष अध्ययन के लिए डा. सुरेन्द्र कुमार द्वारा लिखित मनुस्मृति (प्रकाशित-आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट,दिल्ली) जो http://www.vedicbooks.com पर उपलब्ध है, अवश्य पढ़ें |

डा.सुरेन्द्र कुमार ही नहीं बल्कि बहुत से पाश्चात्य विद्वान जैसे मैकडोनल, कीथ, बुलहर इत्यादि भी मनुस्मृति में मिलावट मानते हैं |

डा. अम्बेडकर भी प्राचीन ग्रंथों में मिलावट स्वीकार करते हैं | वे रामायण, महाभारत, गीता, पुराण और वेदों तक में भी प्रक्षेप मानते हैं |

मनुस्मृति के परस्पर विरोधी, असंगत श्लोकों को उन्होंने कई स्थानों पर दिखाया भी है | वे जानते थे कि मनुस्मृति में कहां -कहां प्रक्षेप हैं | लेकिन वे जानबूझ कर इन श्लोकों को प्रक्षिप्त कहने से बचते रहे क्योंकि उन्हें अपना मतलब सिद्ध करना था | उनके इस पक्षपाती व्यवहार ने उन्हें दलितों का नायक जरूर बना दिया | इस तरह मनुविरोध को बढ़ावा देकर उन्होंने अपना और कई लोगों का राजनीतिक हित साधा | उनकी इस मतान्धता ने समाज में विद्वेष का ज़हर ही घोला है और एक सच्चे नायक मनु को सदा के लिए खलनायक बना दिया |

इसी तरह स्वामी अग्निवेश जो अपने आप को आर्यसमाजी बताते हैं, अपनी अनुकूलता के लिए ही यह भूलते हैं कि महर्षि दयानंद ने जो समाज की रचना का सपना देखा था वह महर्षि मनु की वर्ण व्यवस्था के अनुसार ही था | और उन्होंने प्रक्षिप्त हिस्सों को छोड़ कर अपने ग्रंथों में सर्वाधिक प्रमाण (५१४ श्लोक) मनुस्मृति से दिए हैं | स्वामी अग्निवेश ने भी सिर्फ़ राजनीतिक प्रसिद्धि पाने के लिये ही मनुस्मृति का दहन किया |

निष्कर्ष :

मनुस्मृति में बहुत अधिक मात्रा में मिलावट हुई है | परंतु इस मिलावट को आसानी से पहचानकर अलग किया जा सकता है | प्रक्षेपण रहित मूल मनुस्मृति अत्युत्तम कृति है, जिसकी गुण -कर्म- स्वभाव आधारित व्यवस्था मनुष्य और समाज को बहुत ऊँचा उठाने वाली है |

मूल मनुस्मृति वेदों की मान्यताओं पर आधारित है |

आज मनुस्मृति का विरोध उनके द्वारा किया जा रहा है जिन्होंने मनुस्मृति को कभी गंभीरता से पढ़ा नहीं और केवल वोट बैंक की राजनीति के चलते विरोध कर रहे हैं |

सही मनुवाद जन्मना जाति प्रथा को पूरी तरह नकारता है और इसका पक्ष लेने वाले के लिए कठोर दण्ड का विधान करता है | जो लोग बाकी लोगों से सभी मायनों में समान हैं, उनके लिए, सही मनुवाद ” दलित ” शब्द के प्रयोग के ख़िलाफ़ है |

आइए, हम सब जन्म जातिवाद को समूल नष्ट कर, वास्तविक मनुवाद की गुणों पर आधारित कर्मणा वर्ण व्यवस्था को लाकर मानवता और राष्ट्र का रक्षण करें|

महर्षि मनु जाति, जन्म, लिंग, क्षेत्र, मत- सम्प्रदाय, इत्यादि सबसे मुक्त सत्य धर्म का पालन करने के लिए कहते हैं –

८.१७: इस संसार में एक धर्म ही साथ चलता है और सब पदार्थ और साथी शरीर के नाश के साथ ही नाश को प्राप्त होते हैं, सब का साथ छूट जाता है – परंतु धर्म का साथ कभी नहीं छूटता |

संदर्भ- डा. सुरेन्द्र कुमार, पं.गंगाप्रसाद उपाध्याय और स्वामी दयानंद सरस्वती के कार्य |

अनुवादक- आर्यबाला

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Interpretations on Gita: A scholarly study


Aum calligraphy. Aum (Om) Hindu Symbol

Image via Wikipedia

Interpretations on Gita: A scholarly study
By Dr Vaidehi Nathan
The Bhagavadgita in the Nationalist Discourse, Nagappa Gowda K, Oxford University Press, Pp 286(HB), Rs 695.00

BHAGAVAD Gita the eternal text has been explored and re-interpreted by men since it was originally penned by the great sage Vyasa. Each one has found his/her own meanings and answers from the Gita to quests and queries on life and beyond.

The Bhagavadgita in the Nationalist Discourse by Nagappa Gowda K. has analysed the contemporary understanding of Gita by leaders in 19th- 20th century. Six men have been selected who wrote dissertations on or referred extensively to Gita. They are Bankimchandra Chatterjee, Balgangadhar Tilak, Swami Vivekananda, Aurobindo Ghose, Mahatma Gandhi, Vinoba Bhave and BR Ambedkar. These are all men who influenced the course of the nation — some politically, some spiritually. “The nationalist engagement with the Gita was both emotional and intellectual, since nationalism expressed itself, whether sui generis or as a response-product of engagement with colonialism, at those levels. Locating the source of nationalism in the Gita was a way of rejecting the Western claim that nationalist impulse and ideology were its exclusive gift” says Gowda.

While Bankimchandra saw the Gita as a call for action, for Tilak, as revealed in Gita Rahasya, the appeal was the notion of sthitaprajna, the rejection of sanyasa and a direction for active engagement with life. For Aurobindo, who turned into sage after rejecting active political life, Gita was a text of supreme spirituality, demanding nothing less than total surrender. Gandhi on other hand found in Gita “supreme endorsement of the notions such as non-violence, Swadeshi, Svadharma and Satyagraha.”

interpreted Gita as an embodiment of national culture in true sense. Vinoba Bhave found svadharma as the central theme of Gita. Ambedkar saw Gita in a very different light. He thought it was a text that was trying to revive and justify “the Old Order with a new set of arguments as emanating from the mouth of God.”

Nagappa Gowda says that the Gita came back as a much discussed text of Hinduism because of the interest shown by the westerners in it. According to him, the Europeans, triggered by their eagerness to explore the Indian culture and religion sought out the “native informants.” “The native informants were the Brahmins – a small, literate monopoly class in the country, who thus became the sole spokespersons of religion. Brahmanical religion became the Hindu religion, and Brahmanical texts became the official Hindu texts.

Of them Shree Krishna and his Song Celestial seemed to merit the Semitic notion of a revealed religion… Thus, in the eighteenth century, we see both the orientalist and missionary discourses nudging the Bhagavadgita and its author to the centrestage of attention and engagement.”

Tilak used Gita in the political context. He exalts an all-India-Hinduism, playing down the differences of sect and caste. For Vivekananda the message is beyond India, in a world canvas and it is apolitical. He regards the truth in Gita as universal and not historical, says Gowda adding nishkam karma was the essence of the monk’s message from Gita.

Sri Aurobindo has written extensively on Gita. He wrote 24 essays on the first six chapters, twelve essays on the next six chapters and twelve on the remaining six. The first six chapters, he felt dealt with the notion of karma and its relation with jnana.

Gandhi delivered 218 lectures on the Gita at the Satyagraha Ashram, Ahmedabad over a period of nine months in 1926. He was introduced to the Gita by Edwin Arnold, to an English translation called Song Celestial, when he was twenty years old.

He said, “Only he can interpret the Gita correctly who tries to follow its teaching in practice…it may be a profound one, but in my view the realisation of its profound quality depends on the depth of one’s sincerity in putting its teaching into practice.”

Ambedkar on the other hand saw it as a reiteration of the caste system. The reviving debate on it he said was an attempt at ‘replying’ to the Buddhist preaching, by re-establishing the ‘relevance’ of the caste categorisation. After reading the views on others on the Gita, reading Ambedkar’s gives a feeling of ‘let down.’

One wonders if there was any relevance for his inclusion into this book. For, Ambedkar takes a limited, narrow and constrained attitude towards the text that is widely seen as enlightening, egalitarian and ennobling.

Nagappa Gowda says that the reason why Gita gelled well in the nationalist discourse is that it laid great stress on karma yoga and “undermined the asceticism of the Upanisadic persuasion and emotionalism and devotionalism of the bhakti persuasion.” And also it was seen as upholding a deep commitment to equality.

Gita has been a text of all times. From Adi Shankara, even before him and down the generations men have delved into this changeless doctrine and applied it and explained it as it revealed itself to them.

It has an appeal that has transcended time and space. Nagappa Gowda by contextualising the Gita on the matrix of national movement has given a new perspective worth pursuing. Gowda is Associate Professor, Department of Political Science, Government Women’s First Grade College and Post Graduate Centre, Ajjarakadu, Udupi.

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SURPRISINGLY, A FOREIGNER OPENS OUR EYES!!!


Very interesting!!

IF THIS IS TRUE, NOW YOU KNOW WHAT HAPPENS TO ALL THE MONEY COLLECTED BY TEMPLES IN INDIA.
SURPRISINGLY, A FOREIGNER OPENS OUR EYES!!!
Believe or not, a Foreign writer opens our eyes… The Hindu Religious and Charitable Endowment Act of 1951 allows State Governments and politicians to take over thousands of Hindu Temples and maintain complete control of the money in any way they choose.

A charge has been made not by any Temple authority, but by a foreign writer, Stephen Knapp, in a book Crimes Against India and the Need to Protect Ancient Vedic Tradition, published in the United States that makes shocking reading.
 Hundreds of temples in centuries past have been built in India by devout rulers and the donations given to them by devotees have been used for the benefit of the (other) people. If, presently, money collected has ever been misused (and that word needs to be defined), it is for the devotees to protest and not for any government to interfere.

This letter is what has been happening currently under an intrusive law. It would seem, for instance, that under a Temple Empowerment Act, about 43,000 temples in Andhra Pradesh have come under government control and only 18 per cent of the revenues of these temples have been returned for temple purposes, the remaining 82 per cent being used for purposes unstated. Apparently even the world famous Tirumala Tirupati Temple has not been spared.

According to Knapp, the temple collects over Rs 3,100 crores every year and the State Government has not denied the charge that as much as 85 per cent of this is transferred to the State Exchequer, much of which goes to causes that are not connected with the Hindu community. Was it for that reason that devotees make their offering to the temples?

Another charge that has been made is that the Andhra Government has also allowed the demolition of at least ten temples for the construction of golf courses. Imagine the outcry, writes Knapp, if ten mosques had been demolished. It would seem that in Karanataka, Rs. 79 crores were collected from about two lakh temples and from that, temples received Rs seven crores for their maintenance, Muslim madrassahs and Haj subsidy were given Rs 59 crore and churches about Rs 13 crore.

Very generous of the government! Because of this, Knapp writes, 25 per cent of the two lakh temples or about 50,000 temples in Karnataka will be closed down for lack of resources, and he adds: The only way the government can continue to do this is because people have not stood up enough to stop it. Knapp then refers to Kerala where, he says, funds from the Guruvayur Temple are diverted to other government projects denying improvement to 45 Hindu temples. Land belonging to the Ayyappa Temple, apparently has been grabbed and Church encroaches are occupying huge areas of forest land, running into thousands of acres, near Sabarimala.

 A charge is made that the Communist state government of Kerala wants to pass an Ordinance to disband the Travancore & Cochin Autonomous Devaswom Boards (TCDBs) and take over their limited independent authority of 1,800 Hindu temples. If what the author says is true, even the Maharashtra Government wants to take over some 450,000 temples in the state which would supply a huge amount of revenue to correct the states bankrupt conditions.

And, to top it all, Knapp says that in Orissa, the state government intends to sell over 70,000 acres of endowment lands from the Jagannath Temple, the proceeds of which would solve a huge financial crunch brought about by its own mismanagement of temple assets. Says Knapp:
Why such occurrences are so often not known is that the Indian media, especially the English television and press, are often anti-Hindu in their approach, and, thus, not inclined to give much coverage, and certainly no sympathy, for anything that may affect the Hindu community. Therefore, such government actions that play against the Hindu community go on without much or any attention attracted to them. Knapp obviously is on record.

If the facts produced by him are incorrect, it is up to the government to say so. It is quite possible that some individuals might have set up temples to deal with lucrative earnings. But, that, surely, is none of the governments’ business? Instead of taking over all earnings, the government surely can appoint local committees to look into temple affairs so that the amount discovered is fairly used for the public good? Says Knapp: Nowhere in the free, democratic world are the religious institutions managed, maligned and controlled by the government, thus denying the religious freedom of the people of the country. But it is happening in India.

Government officials have taken control of Hindu temples because they smell money in them, they recognise the indifference of Hindus, they are aware of the unlimited patience and tolerance of Hindus, they also know that it is not in the blood of Hindus to go to the streets to demonstrate, destroy property, threaten, loot, harm and/or kill. Many Hindus are sitting and watching the demise of their culture.

They need to express their views loud and clear. Knapp obviously does not know that should they do so, they would be damned as communalists. But, it is time someone asked the Government to lay down all the facts on the table so that the public would know what is happening behind its back.
 Robbing Peter to pay Paul is not secularism. And temples are not for looting, under any name. One thought ….. that Mohammad of Ghazni has long been dead?????

Sanskrit Speaking Village !!


Karnataka

Image via Wikipedia

Sanskrit Speaking Village !!
Sun, 09/20/2009 – 14:39 — sanjeev851
Sanskrit as an everyday spoken language in the village of Mattur near Shimoga in Karnataka (about 300 Km from Bangalore City)
and 3 other villages in India !!

http://www.organiser.org/dynamic/modules.php?name=Content&pa=showpage&pi…

Sanskrit can become the language of the masses in rural areas
 By Shreesh Deopujari

“……One more medium of imbibing virtues like sense of duty, integrity, devotion, faith, etc. is Sanskrit language. By speaking consistently in devvani (God’s language) the so-called downtrodden or the depressed class of the society also feels elevated. They not only feel confident but also develop samskars, which is the very base of any developmental activity. Therefore, Sanskrit Sambhashan is one of the prominent aspects of rural development, the work being undertaken by swayamsevaks across the country. There are a number of villages in the country where all daily activities of life are conducted only in Sanskrit. The prominent villages in this group are Muttoor and Hosahalli in Karnataka and Jhiri and Mohad in Madhya Pradesh where Sanskrit has truly become language of the masses. More than 95 per cent the people of Muttoor and hundred per cent people in Jhiri speak Sanskrit.

Muttoor (Karnataka)
 Apart from Muttoor, Hosahalli and Jhiri; Mohad and Baghuwar in Madhya Pradesh and Ganoda under Banswara district of Rajasthan are also the villages where Sanskrit is spoken by majority of the villagers. Not only for asking well-being of each other but even while ploughing the fields, talking on telephone, purchasing goods from the grocer’s shop, getting the hair cut at barber’s shop, preparing food in kitchen, etc. people freely speak Sanskrit. The containers having spices and other things in the kitchen too contain the names in Sanskrit. Nobody in these villages thinks what will happen by learning Sanskrit. Whether it will help in getting a job or not. It is our language and we have to learn it is the only feeling amongst them.

Muttoor, the village of about 2,000 inhabitants, is located about 8 km south of Shimoga. The Tunga river flows gently on one side of the village. Its fame as the Sanskrit Gram has spread far and wide. Sanskrit is the spoken language of over 95 per cent of the people here. Soft and dulcet, a conversation sounds like a Vedic recital. Though it is a journey, which began about 500 years ago, Sanskrit has been modified as per the modern needs here by Samskrit Bharati. As one enters the village he is greeted with ” bhavatha nam kim? (What is your name?), “coffee va chaayam kim ichchhathi bhavan? (What will you have, coffee or tea?). The pronunciation of “Hari Om” instead of ‘hello’ and “katham asti” instead of ‘how are you?’ are common here.

Everybody-men, women, children, literate or illiterate-freely speaks Sanskrit. Even the Muslim families speak Sanskrit without hesitation and as comfortably as is spoken by the Hindus. Their children are found in the streets reciting Sanskrit shlokas. Even while fighting and playing cricket in the grounds children freely speak Sanskrit. When one walks down a few places from the school where one touches the ratha veethi (car street) and graffiti on the walls what grabs the attention is: “Maarge swachchataya virajate, grame sujanaha virajante” (Cleanliness is as important for a road as good people are for the village). Other slogans like ‘keep the temple premises clean’, ‘keep the river clean’ and ‘trees are the nation’s wealth’ are also written in Sanskrit and painted on walls reflecting ancient values. There are families who have written on their doors-‘You can speak in Sanskrit in this house.’ This is basically to tell the visitors that in case they are fluent in the language they can talk to them in Sanskrit.

Study of the language here begins from Montessori level, where kids are taught rhymes and told stories in Sanskrit-even Chandamama and comics printed in Sanskrit are available here. While the language is a compulsory subject in schools, teachers and even students talk to each other in it. Muttoor is not a cloistered hermitage shy of the outside world. Many of its youngsters have moved to cities in search of greener pastures in pursuit of higher education. Some are teaching Sanskrit in universities across the State and more than 150 youngmen and women are in the field of IT as software engineers. Many foreign students also visit the village to learn Sanskrit and stay with them in true guru-shishya tradition.

For more than 25 years now the village has been in the forefront of a movement to keep spoken Sanskrit alive. In the local Sharada Vilasa High School, Sanskrit is compulsory till class VIII to X. So, the present generation too has learnt to speak it. Mothers teach children Sanskrit at home.

The credit for this silent revolution surfacing the country to popularising Sanskrit goes to Samskrit Bharati. Thousands of its activists are burning the midnight oil to move forward this movement.

It is not necessary for a person to be literate for learning Sanskrit. Undoubtedly, a literate person can pick up the language easily, but an illiterate person too can learn it. There are thousands of people who were earlier fully illiterate but now speak fluently in Sanskrit. One such example was seen in Baoli village under Baghpat district of Uttar Pradesh where a 50-year-old Shri Jaiprakash speaks fluent Sanskrit. Shri Jaiprakash has never been to school but he learnt Sanskrit only in four camps of Samskrit Bharati organised in Delhi, Haridwar, Meerut and Baraut. Now he teaches Sanskrit to his fellow villagers. All his family members too speak Sanskrit.

Jhiri, Mohad and Baghuwar (Madhya Pradesh)
 Jhiri comes under Rajgarh district of Madhya Pradesh. Total population of the village is 976 and all the people including small children, women, elder people, school-going children, literate and illiterate speak fluently in Sanskrit. Samskrit Bharati had started conducting Samskrit Sambhashan camps in the village in 2002 through an activist Vimla Tewari. She had come here only for one year. But in that one year she developed so much interest of the villagers to the divine language that everybody in the village turned to learn Sanskrit. Now all the villagers love Vimla as their own daughter. Former RSS Sarsanghachalak Shri KS Sudarshan visited this village. He was so much impressed with the command of the villagers over Sanskrit that he, while touring the village, touched the feet of elderly women at four places and sought their blessings. The morning of the people in this village begins with Namo Namah and ends with the greetings of Shubhratri.Anyone who visits this village is thrilled seeing all people speaking fluently in the God’s language.

The village Panchayat takes special steps to popularise Sanskrit in Mohad. Even Scheduled Castes and Scheduled Tribes and Muslim families speak Sanskrit without hesitation. Similar picture can be seen in Baghuwar village, which is near Mohad. In Jhiri, the farmers while ploughing their field even order their oxen in Sanskrit and the oxen too follow those instructions.

Due to the Sanskrit language caste, discrimination between the so-called lower and upper castes has reduced. Those who speak the language can hold his head high in the society. The oneness of the society leads to the development of the village. Jayatu Sanskritam.

(The writer is Akhil Bharatiya Prakalp Pramukh of Samskrit Bharati.) “

Hare Krishna !!

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Wed, 04/14/2010 – 08:37 — burak__
Hi, I wish you all good day,

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 data would be obtained from this site, or hope to. But I want you to know that this site is really good Thanks a lot for the kind of perfect topic about this topic. It’s good to buy an essay about this good topic. Nice article, very helpful e okul. Thanks

Sun, 01/10/2010 – 13:13 — vinaykapp
 hare krishna

am vinay Krishna
 and i really reallly wanted to visit those villages taking my friends along with me and would like to talk to the villagers in their language which ofcourse is my second language in my 12th standard.
just love to see them and would greatly appreciate their will and love upon their mother tongue…
thanks a ton to this page designers

Sun, 09/20/2009 – 19:17 — NityānandaChandra
WOW I want to go there.

WOW I want to go there. Stay there for a few months, imagine how much that would help in learning.

Sun, 01/10/2010 – 13:18 — vinaykapp
let me join u in being there

please let me join u in being there…

Sun, 09/20/2009 – 20:29 — sanjeev851
EXACTLY !!

I too felt the same.. !!
 Im just dying to go there and experience the language being spoken.. and feel as though im 5000 yrs behind at the time when Krishna was on earth !!
 Guess what ?.. This village – Mattur , is just abt 200-300 from my place (Bangalore ) .
 I dont know when i will visit this place..

Knowing sanskrit brings us closer to the vedic litrature .
I wish the language spreads outside this village .

According to me , Sanskrit isnt just a language .. Its something like Mathematics .. Its highly scientific and Systematic..
 In fact the meaning of the word sanskrit is “Systematic” , “Perfect” , “Cultured” ..

I was going through a PDF file with sanskrit lessons, i was amazed to see how systematic it is !!
No doubt its God’s Language (Dev Vani)

If just the language Sanskrit can be so systematic, what abt Bhagavad Gita and other vedic literature? .

Sad to see that Sanskrit isnt given enough importance here.. That is because people do not know its importance here..

Hare Krishna !!

Sikh Gurus, Vedas and Hinduism


Symbol of Sikhism, white and golden version.

Image via Wikipedia

Sikh Gurus, Vedas and Hinduism

April 3, 2011 By Agniveer

Kindly review What does Agniveer
stand for
to understand the overall perspective behind any article on
Agniveer site. Thanks.

Sikhism represents a tradition that every Indian is
proud of. The Sikh Gurus have inspired us in an era that was perhaps the most
challenging phase of our history. One cannot forget the contributions of Sikh
Gurus and their selfless sacrifices to consolidate the society, provide them
direction and overthrow the rule of invaders. That is why the Sikh Gurus are
revered not only by Sikhs but all nationalists in general as role models.

The medieval era represents the darkest phase of our society. Internally we
were being eroded by termites of casteism, gender discrimination and overt
ritualism dissociated from Vedas. And externally, we were being butchered by a
tribe of most uncivilized society of west Asia – read the Ghaznis, Khiljis,
Mughals, Slaves, Tughlaqs etc.

The Sikh gurus, in these turbulent times, lit the lamp of Vedic wisdom and
steered the society towards the fundamental tenets of our culture – rationalism,
actions and compassion.

Often their is dispute over whether Sikhism is part of Hinduism or a separate
religion. In our view, this is a meaningless debate. Because the word Hinduism
has different connotations. From a western mindset, Hinduism represents a mix of
very specific rituals associated with casteism, gender discrimination and idol
worship. If this be Hinduism, then Sikhs are definitely not Hindus.

However, if Hinduism is considered to mean the culture that is inspired from
the philosophy of Vedas, then perhaps not many sects are more Hindu than Sikhs.
Sikhism represents the message of Vedas in simple language of layman.

Let us see what makes Sikhism an extremely pure representation of Vedic
wisdom (We shall ignore later day aberrations and focus on the key message of
the noble Gurus):

– Sikhism rejects birth-based casteism and believes in equality of all

– Sikhism believes in gender equality

– Sikhism believes in protection of cows because it is one of the most useful
gifts of God to humans

– Sikhism believes in actions as means to achieve God. Thus they reject
withdrawal from life.

– Sikhism believes in one single timeless shapeless omnipresent God whose
best name is Onkaar (Om + Kaar). This is almost verbatim translation of
Yajurveda 40.8.

– Sikhism believes in theory of Karma and rebirth

– Sikhism refuses the concept of Heaven/ Hell and believe in salvation as
ultimate goal

– Sikhism believes in Nama Smaran or understanding the names and properties
of God as way to achieve Him

– Sikhism considers Maya or ignorance as obstacle to salvation and urges to
eradicate it through devotion, noble actions and knowledge

– Sikhism takes it as our utmost duty to fight against injustice of any kind.
The lives of Sikh gurus exemplify this.

– Sikhism considers entire humanity as one family and refuses to have
different treatments for people of different beliefs and religions.

The list can continue further. Note that if you replace Sikhism in above
lines with ‘Vedic Dharma’ you would realize that the points still hold
valid.

Further, the Guru Granth Sahib very clearly elucidates on the glory of
Vedas:

1. God created Vedas (Onkaar ved nirmaye- Rag Ramkali Mahla
1 Onkar Shabd 1)

2. With order of God Vedas were created so that humans can decide what is
virtue and sin (Hari aagya hoye Ved paap punya vichaariya- Maru
Dakhne Mahla 5 Shabd 17)

3. No one can value the importance of Rigveda, Yajurveda, Samveda and
Atharvaveda (Sam Ved, Rig, Yajur, Atharvan brahme mukh maaiya hai
traigun, taakee keemat kah na sakai ko….- Marusolahe Mahla 1 Shabd

17)

4. God created day, night, forests, greenery, water and 4 Vedas that are like
4 treasures (Chaar Ved chaare khaani- Rag Maru Mahla 5 Shabd
17)

5. How can glory of Vedas be stated whose knowledge is without end
(Ved vakhaan kahahi ik kahiye, oh ve ant ant kin lahiye- Vasant
Ashtapadiyan Mahla 1.3)

6. Of the infinite texts, Vedas are the best (Asankh granth mukhi Ved
paath- Japuji 17)

7. All the Shastras, Vedas and ancient texts describe the Supreme Lord
(Smriti sastra Ved puraan paar brahm ka karahi vakhiyaan- Gaund
Mahla 5 Shabd 17)

8. Noble persons elucidate the glory of Vedas but unfortunate people do not
understand (Ved bakhiyaan karat saadhujan bhaagheen samjhat nahi
khalu- Todi Mahla 5 Shabd 26)

9. Study of Vedas enhances knowledge by blessings of God (Kahant Veda
gunant guniya…- Sahaskriti Mahla 5.14)

10. Analysis of Vedas, Shastras and ancient texts enriches the entire family
and makes them lucky (Ved puran saasatr vichaaram…. badbhaagi Naanak ko
taaram- Gatha Mahla 5.20)

11. Vedas describe the glory of one God (Kal mein ek naam kripaanidhi
… ih vidhi Ved bataavai- Rag Sortha Mahla 9 Shabd 5)

12. Do not say that Vedas are false. False are those people who do not
analyze (Ved katev kahahu mat jhoothe jhootha jo na vichaare-
Rag Prabhati Kabirji Shabd 3)

13. Those who studied Vedas were called Vedis. They initiated noble virtuous
acts. Listening to Rigveda, Samveda, Yajurveda and Atharveda destroyed all sins.
(Jinai Ved padhyo suvedi kahaaye… Padhe Sam Vedam Yajur Ved Kattham
Rigam Ved paathayam kare bhaav hattham… Atharav Ved pathayam suniyo paap
nathiyam…- Dasham Guru Granth Sahib Vichitra Natak Adhyaya 4)

To check more examples of glory of Vedas in Guru Granth Sahib refer the
following:

14. Chauth upaaye chaare Veda- Rag Bilawal Mahla 1 Thiti

15. Chache chaar Ved jin saaje chaare khani chaar juga- Rag Asa Mahla 1 Pati
Likhi Shabd 9

16. Oordh mool jis saakh talaaha chaar Ved jit laage- Gujri Ashtapadiyan
Mahla 1.1

17. Chare Ved hoye sachiyaar- Asadi Var Mahla 1 Var 13

18. Chaturved mukh vachni uchre- Rag Gaudi Mahla 5 Shabd 164

19. Chaturved pooran hari naai Ramkali Mahla 5  Shabd 17

20. Chaar pukaarahi na tu maane Ramkali Mahla 5 Shabd 12

21. Chaar Ved jihwa bhane- Rag Sarang Mahla 5 Shabd 131

22. Brahme ditte Ved Rag Malar Var Mahla 2 Var 3

23. Chaare Ved Brahme kau diye padh padh kare vichari- Rag Asa Mahla 3 Shabd
22

24. Chaare Ved Brahme np furmaayia- Maaru Solahe 3.22

25. Chaare deeve chahu hath diye eka eki vaari- Vasant Hindol 1.1

26. Vedu pukaare vaachiye vaani brahm biaas- Shreeraag Ashtpadiyan 1.7

27. Vedan ganh bole sach koi- Maajh Vaar Mahla 1 Vaar 12

28. Deeva jale andhera jaai Ved paath mati paapan khaai- Raag Suhi

29. Ved pukaarai punn paap surag narak ka veeu- Raag Saarang Vaar 1.16

30. Gurumukhi parche Ved vichari- Raag Ramkali Sidh Gosht Shabd 28

31. Puchhahu Ved pandatiyaan muthi vin maane- Rag Maaru Ashtpadiyan 1.6

32. Man hath kine na paaiyo puchhahu Vedaam jaai- Shri Raag Vaar 3.10

33. Smriti saasat Ved vakhaanai bharmai bhoola tat na jaanai- Rag Maajh
Ashtpadiyan 3.18

34. Veda mahi naam uttam so- Rag Ramkali Mahla 3 Aanand 19

35. Hari jeeu ahankaar n bhaavai Ved kook sunaavahi- Rag Maaru 3.9

36. Jugi jugi aapo aapna dharm hai sodh dekhahu Ved puraan- Rag Vilaaval
3.4

37. Saasat Ved puraan pukaarahi dharam karahu shat karam dradaiya- Vilaaval
Mahla 4.2

38. Naanak vichaarahi sant jan chaar Ved kahande- Rag Gaudi Vaar 4.12

39. Vaani brahm Ved dharam dradahu paap tajaaiya bal raam jeeu- Suhi Chhant
4.2

40. Das ath chaar Ved sabh poochhahu jan naanak naam chhudaai jeeu- Maaru
4.8

41. Smrat saasat Ved vakhaane jog gyaansidh sukh jaane- Rag Gaudi 5.111

42. Ved puraan smrat bhane- Gaudi 5.144

43. Saasat smrat Ved vichaare mahaapurushan iu kahiya- Rag Gaudi 5.162

44. Ved saasat jan pukaarahi sunai nahi dora- Rag Aasa 5.152

45. Saasat Ved smriti sabhi….- Gujri 5.2

46. Chaar pukaarahi na tu maanahi- Ramkali 5.12

47. Kahant Veda gunant guniya- Salok sahaskriti Mahla 5.14

48. Ved puraan saasatr vichaaram- Gatha Mahla 5.20

49. Ved puraan saadh sang- Rag Gaudi 9.6

50. Ved puraan padhai ko ih gun simre hari ko naama- Rag Gaudi 9.7

51. Ved puraan jaas gun gaavat taako naam hiye mein dhar re- Gaudi 9.9

52. Ved puraan smriti ke mat sun nimash na hiye vasaavai- Rag Sorath 9.7

Now Guru Granth Sahib also consists of several verses that appear to be
condemnation of Vedas. These are often cited to prove that Sikhism is a separate
cult.

However, this is a very childish argument. How can Guru Granth Sahib condemn
Vedas when it also praises it to an extent that it calls Vedas divine and that
those who do not appreciate Vedas as foolish?

In reality, the condemnation of Vedas relate to those people who only mug up
Vedas but do not live their lives accordingly. Or those people who distort the
message of Vedas by claiming to have expertise. The likes of western indologists
and communist historians who see beef and wine in Vedas perfectly exemplify the
target of this condemnation.

And why Guru Granth Sahib, Vedas themselves condemn such hypocrites. Rigveda
1.164.39 very clearly announces – “What can the Richas of Vedas do
for a person who does not possess intellect”
.

Upanishads and Geeta also condemn a person who claims expertise in Vedas but
do not preach.

If one reviews the Guru Granth Sahib dictionary by renowned Sikh scholar Tara
Singhji, you would find a striking similarity between what he wrote on Vedas and
what was written by Swami Dayanand.

Thus we see that Sikhism represents the essence of Vedic wisdom in simple
language of common man and rejects all those external features that are wrongly
associated with Hinduism.

Our humble reverence to the great Sikh Gurus who saved the society by
lighting the lamp of Vedic wisdom when there was utter darkness. Lets now work
to carry forward their noble legacy by living by this wisdom and bringing
transformation in self, society and world through service, devotion and
actions.

(For a thorough treatment of this subject, we strongly recommend the book
“Arya Siddhant aur Sikh Guru” by Swami
Swatantranand, a legendary freedom fighter, leader of Hyderabad
Satyagrah movement and established Vedic scholar. You can avail this book from
www.vedicbooks.com. Please also review
the preface and introduction by Prof Rajendra Jigyasu that covers important
historical aspects of the subject.)

Hindu Gujarati Brahmin Girl’s Achivement.


ગુજરાતની બે છોકરીઓ પાયલોટ બની નાની હતી ત્યારે પ્લેન નાનું દેખાતું, હવે દુનિયા નાની દેખાય છે

– દેશભરમાં માત્ર ૪૦૦ મહિલા પાયલોટ છે અને તે કુલ પાયલોટની સંખ્યાના પાંચ ટકા જેટલી થાય છે ત્યારે ગુજરાતની બે વિદ્યાર્થીનીઓ બંસરી શાહ અને હિરલ વ્યાસે તમામ અડચણો અને મુશ્કેલીઓને પાછળ છોડી કોમર્શિયલ પાયલોટ તરીકેનું લાયસન્સ મેળવ્યું છે. દેશની પ્રથમ મહિલા પાયલોટ સરલા ઠકરાલને રોલ મોડલ માનતી અમદાવાદ નારણપુરાની કેપ્ટન બંસરી શૈલેષભાઇ શાહને ગુજરાતની સૌથી નાની વયની મહિલા પાયલોટ બનવાનો શ્રેય મળ્યો છે.

બાળપણમાં આકાશમાંથી પસાર થતાં વિમાનને જોઇને પાયલોટ બનવાનું સ્વપ્ન જોયા બાદ એક જ લક્ષ્ય અને સખ્ત પરિશ્રમ પછી માત્ર ૧૯ વર્ષની વયે અમદાવાદની બંસરી શાહ અને ગાંધીનગરની હિરલ વ્યાસે કોમર્શિયલ પાયલોટ બનીને પોતાનું સપનું સાકાર કર્યું છે. દેશભરમાં માત્ર ૪૦૦ મહિલા પાયલોટ છે અને તે કુલ પાયલોટની સંખ્યાના પાંચ ટકા જેટલી થાય છે ત્યારે આ બંને ગુજરાતી છોકરીઓએ તમામ અડચણો અને મુશ્કેલીઓને પાછળ છોડી કોમર્શિયલ પાયલોટ તરીકેનું લાયસન્સ મેળવી લીધું છે. અભ્યાસ અને તાલિમ પાછળ લાખો રૃપિયાનો ખર્ચ, તનતોડ મહેનત અને રોજગારીની સાવ ઓછી તક વચ્ચે આ ક્ષેત્રમાં ગુજરાતી યુવાનો ઓછા જોડાય છે અને ખાસ કરીને યુવતિઓ માટે ખરેખર પડકારરૃપ બની જાય છે.જુન-૨૦૦૮ની બેચમાં અભ્યાસમાં જોડાનાર કુલ ૪૦ વિદ્યાર્થીઓની બેચમાં માત્ર પાંચ વિદ્યાર્થી કોમર્શિયલ પાયલોટનું લાયસન્સ મેળવવામાં સફળ રહ્યા છે અને તેમાં હિરલ અને બંસરી બે જ યુવતિઓ છે.
દેશની પ્રથમ મહિલા પાયલોટ સરલા ઠકરાલને રોલ મોડલ માનતી અમદાવાદ નારણપુરાની કેપ્ટન બંસરી શૈલેષભાઇ શાહને ગુજરાતની સૌથી નાની વયની મહિલા પાયલોટ બનવાનો શ્રેય મળ્યો છે. બંસરી કહે છે કે, ધગશ, સખત મહેનત કરવાની તૈયારી અને થોડું નસીબ હોય તો આ ક્ષેત્રમાં સફળતા મળે છે. પ્રથમ તબક્કે મેડીકલ ચેકઅપમાં મને રીજેક્ટ કરવામાં આવી હતી પરંતુ હતાશ થયા વિના મે પ્રયત્ન ચાલુ રાખ્યા અને આખરે તેઓને પોતાની ભૂલ સમજાઇ અને મને એડમિશન આપી દીધું હતું. થિયરી અને પ્રેક્ટિકલ બંનેમાં સખત મહેનતની જરૃર પડે છે જેનાથી કંટાળીને અમારી બેચના અનેક વિદ્યાર્થીઓ અધવચ્ચે જ અભ્યાસ છોડી ગયા હતા.
ગાંધીનગરની કેપ્ટન હિરલ અશ્વિનભાઇ વ્યાસ પોતાની સફળતાનો શ્રેય માતા ભાવનાબેન અને પિતા અશ્વિનભાઇને આપતા કહે છે કે, નાનપણમાં જ્યારે કોઇ જ સમજ ન હતી ત્યારે આકાશમાં જોઇને પ્લેન ઉડાડવાની કહેલી વાતને માતા-પિતાએ ગંભીરતાથી લીધી અને અભ્યાસ તેમજ કારકિર્દીના દરેક તબક્કે માત્ર અને માત્ર પાયલોટ બનવા સિવાય અન્ય કોઇ વિકલ્પ ઉપર ચર્ચા થતી નહીં. આ માટે ઘરમાં હકારાત્મક વાતાવરણ ઉભું કરવામાં આવ્યું હતું.તાલિમ વખતનો યાદગાર અનુભવ જણાવતા હિરલે કહે છે , અમદાવાદથી પાલીતાણા અને ત્યાંથી મહેસાણા સોલો ફ્લાઇંગ કરવાનું હતું. હું ટુ સીટર પ્લેન ફ્લાય કરતી હતી, તે વખતે પાલિતાણા પાસે ડાબી તરફથી પક્ષીઓના ઝૂંડ જેવું કશુંક મારો રૃટ ક્રોસ કરી રહ્યું હોય તેવું લાગ્યું. મેં એટીસી સાથે રેડિયો વડે સંપર્ક કર્યો પરંતુ કોઇ જવાબ મળ્યો નહીં. એટલીવારમાં તે વસ્તુ નજીક આવતાં એકાએક મને ખ્યાલ આવ્યો કે આ તો હેલિકોપ્ટર છે. સ્હેજપણ ગભરાયા વિના મેં સિફતપુર્વક મારા પ્લેનનું લેવલ વધારી દીધું અને હેલિકોપ્ટર બરાબર મારા પ્લેનની નીચેથી પસાર થઇ ગયું.
અમદાવાદ એવિએશન એન્ડ એરોનોટીક્સ સંસ્થામાંથી કોમર્શિયલ પાયલોટનું લાયસન્સ લીધા બાદ બંનેએ એક ખાનગી એરલાઇન્સમાં જોડાવા માટેની એક્ઝામ આપી છે.બંસરી અને હિરલ એકસાથે કહે છે કે, પાયોલોટ બનવા માટે તનતોડ મહેનત અને ૨૫થી ૩૦ લાખ રૃપિયાનો ખર્ચ થાય છે. જેના કારણે દરેક વ્યક્તિ ઇચ્છતી હોવા છતાં આ ક્ષેત્રમાં આવી શકતી નથી. આ માટે સરકાર દ્વારા પણ કોઇ મદદ મળતી નથી. માત્ર અનામત કેટેગરીમાં આવતા વિદ્યાર્થીઓને સ્કોલરશીપનો લાભ અપાય છે પરંતુ તેમને લાયસન્સ માટે સમયમર્યાદા અપાતી હોવાથી તેઓ પણ લાભ મેળવી શકતા નથી.
સરકાર આ ક્ષેત્રમાં આવવા માટે વિદ્યાર્થીઓને સ્કોલરશીપ અને અન્ય પ્રોત્સાહન આપે તે જરૃરી છે. આ જ રીતે પાયલોટ બની ગયા બાદ પણ રોજગારી માટે ભારે સંઘર્ષ કરવો પડે છે. ભારતની એરલાઇન્સ દ્વારા વિદેશી પાયલોટને પ્રથમ તક અપાય છે. હાલમાં ભારતની એરલાઇન્સમાં ૪૦ ટકા વિદેશી પાયલોટ છે. જેથી સ્થાનિક પાયલોટને જોઇએ તેવી તક મળતી નથી.
વળી અહીંના પાયલોટ વિદેશની કોઇ એરલાઇન્સમાં જોડાઇ શકતા નથી કેમ કે, તેઓના નિયમ પ્રમાણે ત્યાંના પેપર્સ ક્લીયર કરવા પડે છે અને ત્યાંની સિટીઝનશીપ મેળવવી પડે છે. ઇન્ડીયામાં આવા કોઇ નિયમ નથી. મંદી દરમિયાન પાયલોટની ભરતી સદંતર બંધ થઇ ગઇ હતી. જોકે, હવે થોડા પ્રમાણમાં રીક્રુટમેન્ટ શરૃ થઇ છે.

Hindu Gujarati Pilot Girl Miss. Vyas

Amazing achivements of Hindu Gujju Girl Miss Vyas.

 

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